Thursday, 8 January 2015

देवी - वन्दना - जय - जय भैरवि असुर - भयाउनि -हिंदी में अनुवाद सहित

देवी - वन्दना - हिंदी में अनुवाद सहित
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जय - जय भैरवि असुर - भयाउनि
पसुपति - भामिनि माया ।।१।।
जय जय माता की , हे माँ तुम्हारी जय हो
तुम्हे देखकर असुर डर से काँप उठता हैं और तुम्हारी माया प्रभु शंकर को प्यारा है ।।१ ।।
सहज सुमति बर दिअ हे गोसाउनि
अनुगति गति तुअ पाया ।।२।।
हे माँ मैं तुम्हारा पैर पकड़ता हूँ , तुम तुरन्त मुझे एक वरदान दो जिससे मेरा गति अच्छी हो और मैं तुम्हारी आशीर्वाद से धन्य हो जाऊं।।२ ।।
बासर - रैनि सबासन सोभित
चरण, चंद्रमणि चूड़ा ।।३।।
तुम दिन - रात मुर्दे की आसन पर विराजमान रहती हो, और शिर से पाँव तक तुम्हारी तेज एक मणि की तरह चारों तरफ प्रकाश फैलाई हुयी है।।३ ।।
कतओक दैत्य मारी मुँह मेलल,
कतेक उगिलि करू कूड़ा ।।४।।
हे माँ तुमने कितने दैत्य को मारकर मुँह में रक्खा है , और कितने को निकालकर कुल्ला कर दिया ।।४ ।।
सामर बरन, नयन अनुरंजित,
जलद - जोग फुल कोका ।।५।।
श्यामल वर्ण और तुम्हारा रंगा हुआ आँख ऐसे लग रहें हैं जैसे कोई बादल में लाल कमल का फूल निकल आया हो ।।५ ।।
कट - कट विकट ओठ- फुट पाँड़रि
लिधुर - फेन उठ फोका ।।६।।
तुम्हारे लाल फूल जैसे होंठो से एक विकट सी आवाज हो रही है जिसमे से शोणित की धार बुद - बुदाकर निकल रही है ।।६ ।।
घन घन घनन घुघुर कत बाजए,
हन हन कर तुअ काता ।।७।।
तुम्हारी पाँव की घुंघरू बहुत जोर से बज रही है और तुम्हारी तलवार हन - हना रही है ।।७ ।।
विद्यापति कवि तुअ पद सेवक,
पुत्र बिसरु जनि माता ।।८।।
माँ ये विद्यापति तुम्हारा दास है , तुम्हारा पुत्र है , इसे मत भूलो , आशीर्वाद दो ।।८ ।।
अनुवादक : संजय झा "नागदह"
08/01/2015
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दिअ = दो
गोसाउनि = गोस्वामिनी, भगवती
पाया = पैर
बासर = दिन
रैनि = रात
सबासन = शवासन = मुर्दे पर आसन
चंद्रमणि = चन्द्रकान्तमणि
चूड़ा = शिखर
कतओक = कितना ही
मेलल = रखा
कूड़ा = कुल्ला
अनुरंजित = रंगा हुआ , लाल
जलद जोग फुल कोका = बादल में लाल कमल फूलें हों
पाँड़रि = एक लाल फूल
फोका = बुद बुद
काता = कत्ता, तलवार