Wednesday, 26 February 2014

शेरो - शायरी

जुवां सहम गयी  तेरी दीदार से - ऐसा लगा अमावस कि रात पूर्णिमा हो गयी 

जैसे ही कि तुमने जाने कि बात - वही दिन और वही रात हो गयी 


इंकार मुहब्बत कौन करे - जब डूबा दोनों प्यार कि सागर में 

पहले तुम निकलो तो तुम निकलो - दोनों डूब गए इस सागर में



हो आया प्यार उसे उससे - मगर प्यार नहीं हो पाया प्यार को उससे,

सबसे सब प्यार करे जरुरी नहीं - मगर उसकी जुबां से इंकार भी नहीं आया ता उम्र !!

Friday, 14 February 2014

मैथिलक लेल पाग शोभा मात्र नहि, संस्कार सेहो थिक



दिल्ली,मिथिला मिरर-संजय झाः पागक संस्कार के शुरुआत अगर ब्राम्हण जाति सँ देखि त सबसँ पहिने एकर उपयोग उपनयन संस्कार के मड़ब ठट्ठी (अर्थात जाहि दिन मड़बा के बन्हबाक दिन होएत छैक) ताहि दिन सँ शुरू होइत छैक, ओहो नव नहि अपितु पुरान पाग सँ ,कारन कदाचित इ मानल जाएत होय कि बालक एखन पूर्ण संस्कार नहि पओलाह अछि तै पुरान पाग पहिराओल जाए. इ क्रम अपनयन संस्कार के समस्त विधि व्यवहार के संपन्न करैत केश कटाएलाक बाद स्नान सँ सुद्ध होएबा तक रहैत अछि. तदोपरांत जखन स्नान कए नव वस्त्र धारण कएल जाएत अछि तखन नव वस्त्रक संग - संग नव पाग सेहो वरुआ के पहिराओल जाएत अछि, इ बुझि जे आब ई एही योग्य संस्कार युक्त भय गेलाह, अर्थात पूर्ण शुद्धि गायत्री मंत्रोपरांत, पाग- बस्त्र धारण मंत्र के संग पहिराओल जाएत अछि.
पागक अनिवार्य दोसर चरण विवाह में देखल में जाएत अछि आ संग - संग ओही वर्षक वरक पावनि- तिहार में सेहो परन्तु ओही पाग में आलरी - झालरी जोड़ि क' व ओहुना. संस्कार युक्त पागक चरण मुख्य रूप सँ मात्र दू देखल यदा - कदा तेसर वा चारिम चरण होएत होए कही नहि. आब जौं देखि त बाँचल सम्मान, जे मिथिला में प्रायः लोक अपन आमंत्रित अतिथि वा सम्बन्धी लोकनि के विदाई स्वरुप भेंट में सम्मानित कय पाँचो टुक वस्त्र के संग - संग अपना ओही ठाम सँ पाग पहिरा बिदा करैत छथि, अर्थात अपना ओहिठाम ई पाग एकटा सम्मान सूचक अछि. ओना जौं देखल जाए त' माथ पर रखबा योग्य सबकिछु बहुतो भाषीय - प्रांतीय लोकक रीती रिवाज़ में सम्मान सँ जोड़ल गेल अछि, चाहे ओ सरदारजीक पगड़ी हो वा राजस्थानीक पगड़ी वा अन्यत्र कतहु कोनो आर नाम सँ, मुदा मिथिलाक सुप्रसिद्ध मैथिलक इ पाग छी माथ परहक ताज छी.
अगर उदहारण स्वरुप देखि त सबकियो अपना -अपना घर - आँगन में किनको ने किनको बजैत सुनने होयब जे माय के बेटी कहैत छथि - धिया रखिह तू नैहर के मान कि बाबू के पाग रखिह, पाग एकटा गर्भित सम्मान अछि जे कि नहियो माथ पर रहला सँ सदैव विदयमान रहैत छैक वा ओ बड़का पाग बाला छथि अर्थात सम्मानित व्यक्ति छथि, पाग दिअनु अर्थात सम्मान दिअनु. पागक हर रंग के अलग - अलग पहचान आ अर्थ छैक, जेना उपनयन आ विवाह में मात्र लाल रंगक पाग पहिरल जाइत अछि आ क्रीम रंग या पीअर या अन्य रंगक पाग सिर्फ सम्मान देबाक बास्ते उपयोग कएल जाएत अछि. मात्र बीसेक वर्ष पूर्व पागक खूब चलन छल, लेकिन ओहु समय में बुजुर्ग लोकनि पाग पहिरि सर- कुटुंब लग पहिर जाइत छलाह, अनिवार्य रूप सँ बरियाती में ताहि में त' कोनो मेष- वृषक बाते नए, परन्तु आब त पाग पहिर जएबा में कदाचित लजाइत छथि. एही एक - दू वर्ष में पुनः पागक प्रचलन के बढ़ाबा देखल जा रहल अछि, ओहु में एक ठाम हम अपना आँखि सँ देखल जे जतेक बुजुर्ग लोकनि छलाह से सब कियो पाग पहिर बरियाती आयल छलाह कदाचिद इ बुझी जे जाहि गाँव बरियाती जा रहल छि ओहि ठामक लोक दूर नहि कहय.
ओ बरयाती सुदई सँ नागदह श्री हेम चन्द्र झा "बौआजी" ओहिठाम आयल छलाह. ओना नागदह में सेहो भव्य स्वागत भेलनि ताहि में कोनो संदेह नहि. एकटा समय छल जखन पाग सभ मैथिल वर्ग आ वर्णक लोक समय - समय पर पहिरल करथि, तकर ब्राम्हण का कर्ण दुई जाति सँ भिन्न जातिक लोक क्रमशः सर्वथा बहिष्कार कए देल. एम्हर अबैत - अबैत त' आब से हाल भेल अछि उपनयन काल में बरुआ तथा विवाह - द्विरागमन काल में वर मात्र अनिवार्यतः पाग पहिरल करैत अछि. वरियातिक लेल पाग पहिरब विरल भए चुकल अछि. मिथिला में जतय पाग सँ एक दोसर के सम्मानित कएल जाईत अछि त' दोसर दिस संस्कार के सेहो पूर्ण करैत अछि. अतः इ कहबा में कोनो अतिश्योक्ति नहि जे पाग मैथिलक पहचान आ सम्मान मात्र नहि अपितु संस्कार सेहो अछि. अतः मैथिल समाज सँ आग्रह जे पुनः सब वर्ग आ वर्णक लोक एही सम्मान आ संस्कार युक्त पाग के अपन माथ पर राखि मिथिला के निखारक प्रयास करथि.

मिथिला में प्राण वियोग, विष्णु लोक जयबाक मार्ग

http://www.mithilamirror.com/news-detail.php?id=249

दिल्ली,मिथिला मिरर-संजय झाः जगत जननी भगवती मैथिली, मिथिला के धरती माता सँ सदेह प्रकट भेल छथि. ताहि हेतु भगवती सीता (मिथिलायां भवा) "मैथिली" नाम सँ विख्यात छथि. महाशक्ति भगवती मैथिली स्वतः मनुष्य रूप में भेलीह ताहि हेतु पिता के नाम जोड़वाक कारन देहयुक्त विदेह राजा जनक जी के चुनली. राजर्षि विदेह के द्वारा हलाकर्षण सँ भगवती सीता जी अवतरित भेलीह. अतएव राजर्षि विदेह भगवती सीताजीकें जनक आ हुनकर पौष्य पुत्री भगवती सीता जानकीक नाम सँ प्रसिद्ध भेलीह. महाशक्तिक अन्यन्य उपासक शाक्त मैथिल ब्राम्हण मैथिलीकें काली, दुर्गा, भैरवी, भुवनेश्वरी आदि - आदि नाम सँ अपन इष्ट देवता मानैत आवि रहल छथि. महाशक्ति मैथिली मिथिला कें माईट सँ अवतरित भेल छथि ताहि हेतु मिथिलावासी पार्थिव देव पूजा के सर्वोपरि मानैत आवि रहल छथि.

प्रायः मिथिला के प्रत्येक घर में प्रातः सायं अनावरित माईट के पिंड स्वरुप भगवती के पीड़ी के पूजा होइत अछि. गहवर में भगवती बिसहरा (सर्प देवता) के पीड़ी सेहो माईट के देखल जाइत अछि आ जे सब सलहेस के पूजा करैत छथि हुनका सब के घर में सेहो माईटक पीड़ी देखल जाइत अछि. अकाल या महामारी आदि दैवीय प्रकोप के समय सेहो शान्ति के लेल लाखक - लाख संख्या में पार्थिव शिवलिंगक पूजा होइत अछि चाहे गाँव में नर्मदा शिवलिंग कियाक ने होय अर्थात शिव मंदिर रहलपरान्तो. मिथिला के लोक पार्थिव शिवलिंगक पूजा बहुत बेसी करैत छथि कियाक त' एहन धारणा अछि जे मनुष्य शरीरक निर्माण क्षिति, जल, पावक, गगन, समीर इ पंचतत्व सँ भेल अछि जाहि में आधा तत्व क्षिति आ आधा तत्व पृथ्वी अछि. एही पृथ्वी तत्व सँ मुक्ति के लेल मृतिका महादेव या शिवलिंग बनाक पूजा अर्चना करैत छथि ओकर पाछा भाव इ जे मनुष्यक शरीर में मृतिका वाला भाग मृतिकामय शिव के समर्पित कएल जाय आ बांकी चारि तत्व बाँचि जाय जाहि सँ फेर मनुष्य शरीरक निर्माण नहीं भ सकय आ मानव शरीर सँ छुटकारा भेट जाए.
इ एकटा प्रमुख कारन अछि जे मिथिला में मृतिका शिवलिंगक पूजा खूब होइत अछि. गाछी या नदी के किनार वा जाहि ठाम चिता में अग्नि देल जाइत अछि ओहि ठाम चिता के पीड़ी बनेयबाक प्रथा सेहो विशेषक मिथिला में अछि. मिथिला में वयोवृद्ध भय मरणासन स्थिति में अर्थात अंत समय में भूमिदान करबाक विधान सेहो महामाया मैथिली के प्रति स्नेह अछि. पुराण में प्रासंगिक कथा के अनुसार - धनुष यज्ञ के बाद भगवान् राम अपन धर्म पत्नी सीता के द्विरागमन के दिन (अयोध्या प्रस्थान ) समस्त मिथिला के चारु वर्ण के नर - नारी अपन - अपन मनोरथ के भावानुसार नाना प्रकार के उपहार यथा ठकुआ, चूड़ा, दही, केरा, मछली, मखान, टिकुली, सिंदूर, फूल-माला आदि अपन पुत्री के विदाई उपकरण सामग्री सँ जनकजीकेँ राजधानी के सजा देने छल.प्रायः इ प्रकरण आजुक समय में सेहो अछि जे अपन समाजक लोक सेहो बेटी के विदाई करैत छथि अंतर एतवे जे जिनकासँ जिनका होइत अछि, स्तर थोड़ेक छोट भ गेल अछि. विदाई के समय मैथिली के विछोह में जनक राजपरिवार के संग-संग समस्त मिथिलाके नर - नारी ओहिना बिलखि - बिलखि क कानि रहल छल जेना लोक अपन पुत्री के लेल कनैत अछि.
मिथिलावासीकेँ एहन आत्मविभोर देखि मैथिली बहुत प्रभावित भ गेलीह आ मोने मोन सोच में पड़ी गेलीह, जे आब हम मिथिला सँ जा रहल छि तैं मिथिलाक समस्त जीव - जंतु, पशु - पक्षी, नर - नारी, हमर विछोह में सिसकि -सिसकिक कानि रहल अछि. लेकिन हमरा महामाया बुझितो बेटी बुझि कियो किछु मांगी नहि रहल अछि. इ सब बात सोचैत भगवती धरती माता के पीड़ी के प्रणाम क धीरे - धीरे खरखरिया (कहार) में बैस गेलीह. मिथिला नरेश के आज्ञा भेटलाक बाद अयोध्या के कहरिया जखन कहार उठाबक प्रयास केलक त कहार टस सँ मस नहि भेल. धनुष यज्ञ के बाद ई दोसर मैथिली के चमत्कार छल , इ देखि मिथिलावासी प्रसन्न भ गेल - "भूप सहसदश एकहि बारा" वोहन धनुष जे एक आंगुर सँ उठा लैत छल, ओहन बेटी के अयोध्या के कहरिया केना उठा लेत ? इ विषय हास्य में उद्घोष होमय लागल. समस्त नर - नारी गर्व सँ ताली बजावय लागल.
इ देखि अयोध्यापति महाराज दशरथ आवेश में आवि महावल मल्ल के सीता के सवारी उठावक आज्ञा देलनि. लेकिन मर्यादा पुरोषत्तम भगवान् श्री राम स्वयं मुस्कुराइत खरखरिया के नजदीक आवि सीता सँ पुछलाह - ' इ फेर दोसर चमत्कार किमर्थ ! इ सुनि जनकनंदनी मैथिली मिथिलावासी के तरफ आंगुर सँ इशारा करैत बजलीह - " प्रभु आई हम मिथिला के समस्त जीव - जंतु, पशु - पक्षी, नर - नारी, के स्नेहश्रु में बहि रहल छि एकर सबहक उद्धारक बनीयौ. बिदाई के समय आई हम मिथिला के बेटी धनुषयज्ञ विजयी अहाँ सँ इनाम स्वरुप वरदान मंगैत छि कि " हमर मिथिला के धरती पर जिनकर प्राण वियोग होई, वो बिना कोनो तरहक रुकाबट के जीवन सँ मुक्त भ विष्णु लोक में निवास करैक " . इ सुनिते भगवान् श्री राम कहलाह तथास्तु . आ तहने उठी सकल मैथिलीक खरखरिया. इ कहबा में कोनो अतिश्योक्ति नहि जे मिथिलाक प्रत्येक आचार व्यवहार शास्त्र - पुराण सँ संगत अछि.
(मैथिली अनुवाद डॉ .कृष्ण कुमार झाक लिखल पुस्तक सँ आ किछु - किछु हमरा द्वारा सेहो जोड़ल गेल अछि.)

http://www.mithilamirror.com/news-detail.php?id=249